सब तक संगीत की रस धार पहुँचे, सब हो जाएँ पार

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स्वरांगी साने, पुणे

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‘खुसरो दरिया प्रेम का, जो उलटी वाकी धार, जो उभरा सो डूबा, जो डूबा सो पार ’…

अमीर खुसरो जो स्वयं बड़े संगीतज्ञ भी थे, जब वे कहते थे तो उसका संबंध केवल प्रेम के ऊपरी अर्थ से न होकर कला के हर पहलू से भी होता है। उनके कहे को मान-जान कर जो गाँठ बाँध लें वह मंदार और दाक्षायणी कहलाता है। ये नाम हैं उन दो युवाओं के, जो बड़े चुपचाप तरीके से अपना काम कर रहे हैं… संगीत में डूबकर न केवल अपनी नैया बल्कि अन्य कई लोगों को संगीत की रस धार का आनंद दे, उनकी नैया भी पार कराने में लगे हैं।

मंदार कारंजकर और दाक्षायणी आठल्ये

वंचितों की बात आती है, तो हर क्षेत्र में एक तबका वंचितों का है, लेकिन हर क्षेत्र की वंचितों की सुध नहीं ली जाती। कौन सोच सकता है कि जिन्हें अच्छा संगीत सुनने को नहीं मिलता उन लोगों तक संगीत को ले जाया जाए। गाँव-कस्बों के ऐसे सैकड़ों-हज़ारों लोग जो नगरों-महानगरों में होने वाले संगीत सम्मेलनों में नहीं जा सकते, न उनके पास उतनी सुविधाएँ हैं न उन सुविधाओं का उपभोग करने के दाम चुकाने की ताकत। तो इन लोगों तक पुणे के दो युवा खुद शास्त्रीय संगीत लेकर पहुँचते हैं। ये पति-पत्नी है- मंदार कारंजकर और दाक्षायणी आठल्ये। वे कहते हैं- हमारा लक्ष्य भारतीय शास्त्रीय संगीत को हर उस भारतीय तक पहुँचाना है, जो इससे वंचित है। दोनों के गले में जादू है, मंदार तो बांसुरी और तबला भी बजाते हैं। उन्होंने ‘बैठक फाउंडेशन’ की स्थापना की है और वर्तमान में वे चार प्रोजेक्ट कर रहे हैं।

मंदार बताते हैं, मैंने बी.टेक. किया, बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी भी, लेकिन लगा कि मैं उसके नहीं बना और मैंने अपनी यात्रा शास्त्रीय संगीत की ओर मोड़ दी। मेरी लिखी दो किताबें, बैठक फाउंडेशन, शास्त्रीय गायन-वादन मेरी संपत्ति बन गए। टाटा इंस्टीट्यूट से समाज विज्ञान की पढ़ाई पूरी करने वाली दाक्षायणी कहती हैं, मैंने दस साल की आयु से कीर्तन करना शुरू किया था। इस दंपत्ति ने ‘बैठक’ को गैर लाभदायी ट्रस्ट की तरह खड़ा किया, पंजीकृत किया। उनका मानना है कि शास्त्रीय संगीत सीधे योग शास्त्र से जुड़ा है जो सबके लिए उपयोगी है, बावजूद यह शालीन-कुलीन वर्ग तक ही सीमित है। हमारा फाउंडेशन इसे सरकारी स्कूलों, स्कूलों में आयोजित सभाओं में ले जाता है, हम चाहते हैं इसका आस्वाद सभी ले सकें।

‘बैठक स्कूल म्यूज़िक कार्यक्रम’ पुणे के स्कूलों में होता है जहाँ वे संगीत और प्रतिभा को बढ़ावा देते हैं। बहुत छोटी उम्र में शास्त्रीय संगीत के प्रति रूचि जगाने के उद्देश्य से इसे किया जाता है। पुणे के येरवड़ा के बाबू जगजीवन राम स्कूल में निजी और सार्वजनिक भागीदारी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) में वे संगीत की शिक्षा रोज़ दे रहे हैं। वहाँ के बच्चे संगीत सीखते हैं, पुराने रिकार्ड्स सुनते हैं, वृतचित्र देखते हैं और भारतीय शास्त्रीय संगीत से संबंधित किताबें पढ़ते हैं। इसी तरह पुणे के डहाणुकर कॉलोनी स्थित कन्या दृष्टिहीन विद्यालय में पढ़ने वाली छात्राओं में से 20 गांधर्व संगीत महाविद्यालय की परीक्षा दे रही है।

इसी के साथ फाउंडेशन द्वारा महान् संगीतकारों पर केंद्रित चित्रमय किताबों को भी प्रकाशित करता है ताकि बच्चों को उनके बारे में आसानी से बताया जा सके। स्कूलों में भारतीय शास्त्रीय संगीत की सभा का आयोजन उनका तीसरा कार्य है। सरकारी स्कूलों के बच्चे, उनके अभिभावक, शिक्षक ऐसे किसी आयोजन में गए नहीं होते तो उनके लिए यह अद्भुत होता है। इन स्कूलों में युवा गायक, वादक, धुर्पद गान करने वाले, शास्त्रीय नर्तक आदि अपनी प्रस्तुति देते हैं। प्रस्तुति के बाद प्रश्नोत्तरी का भी आयोजन होता है। इसके साथ वे अपरंपरागत मंचों-बैठकों में प्रस्तुति देते हैं। शास्त्रीय संगीत को हमेशा बड़े सभागारों-मंचों से सुना गया है। पर वे कैफे, घर-आँगन जहाँ कलाकार भी उस कलाकारी के गुमान में न रहे और सुनने वाले भी सहज रहे। तब वे भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ नाट्य संगीत, संत ज्ञानेश्वर-तुकाराम के अभंग, कबीर के पद और खुसरो को गाते हैं और रस धार बहती चली जाती है।

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