काशी का स्वरपुरुष अब मौन है: पंडित छन्नूलाल मिश्र को भावभीनी श्रद्धांजलि

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काशी के घाटों और गलियों में गूंजने वाली ठुमरी की आत्मा, अब मौन हो चुकी है। पद्मविभूषण पंडित छन्नूलाल मिश्र का निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं है, यह उस परंपरा का मौन होना है जिसमें संगीत जीवन का उत्सव भी था और भक्ति का साधन भी। 2 अक्तूबर की भोर में उन्होंने अपनी बेटी नम्रता मिश्र के मिर्ज़ापुर स्थित घर पर अंतिम श्वास ली। अंतिम संस्कार वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।

1936 में आज़मगढ़ के हरिहरपुर गाँव में जन्मे पंडित छन्नूलाल मिश्र बचपन से ही संगीत के साए में पले। हरिहरपुर, जिसे ‘संगीत ग्राम’ भी कहा जाता है, ने कई बड़े कलाकार दिए, और उसी परंपरा से पंडितजी ने अपनी यात्रा शुरू की। बनारस घराने की गूढ़ता को उन्होंने ख्याल और ठुमरी की तानों में ढाला, वहीं कजरी, चैती और दादरा जैसी लोकधुनों को भी वे उसी शास्त्रीय गरिमा के साथ गाते थे। उनकी आवाज़ में बनारस की मस्ती, गंगा की पवित्रता और लोकगीतों की सहजता बहती थी।

उनकी ठुमरी ‘गोरी तोरे नैना बड़े चितवन चुरावें’ या कजरी ‘बरसन लागी बदरिया सावन की’ सुनते ही श्रोता मानो सीधे काशी की गलियों में पहुँच जाते। वे भजन गाते तो उसमें संत कबीर और तुलसीदास की आत्मा उतर आती। उनका गायन केवल स्वर और लय का खेल नहीं था, बल्कि जीवन का दर्शन था।

उनकी संगीत साधना को देश-विदेश में सराहा गया। भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण (2010) और पद्मविभूषण (2020) से सम्मानित किया। यश भारती और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार ने भी उनके योगदान को मान्यता दी। लेकिन सच तो यह है कि उनका सबसे बड़ा पुरस्कार था—वाराणसी के घाटों से लेकर दिल्ली के संगीत सभागारों तक, श्रोताओं का प्रेम और आशीर्वाद।

उनके निधन की खबर के बाद संगीत जगत और समाज में शोक की लहर दौड़ गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा—“पंडित छन्नूलाल मिश्र का जाना भारतीय संगीत के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने जीवन भर कला और संस्कृति को समर्पित किया। बनारस की आत्मा को अपनी गायकी में जीवित रखने वाले इस महान कलाकार को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।”

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने श्रद्धांजलि दी और कहा—“उनकी ठुमरी और लोकधुनें भारतीय सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध करती रहेंगी। उनका जाना संगीत और संस्कृति जगत के लिए गहरी क्षति है।”

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा—“उन्होंने शास्त्रीय और लोक संगीत को जन-जन तक पहुँचाकर भारतीय संस्कृति को गौरव दिया। उनकी विदाई संगीतप्रेमियों के लिए गहरी पीड़ा है।”

लोकगायिका मनीषा अवस्थी बोलीं—“काशी की लोकधुन आज नीरव हो गई है। पंडितजी वह सेतु थे जिन्होंने शास्त्रीय और लोक संगीत के बीच पुल बनाया। उनकी ठुमरी और कजरी सुनते हुए हम बड़े हुए हैं।”

पंडित जसराज की पुत्री दुर्गा जसराज ने भावुक शब्दों में कहा—“उनकी गायकी जादुई थी। जब वे मंच पर आते तो वातावरण बदल जाता था। भारतीय शास्त्रीय संगीत ने आज अपने स्तंभों में से एक को खो दिया है।”

पंडित छन्नूलाल मिश्र केवल गायक नहीं थे, वे ‘गुरु’ भी थे। उनके शिष्यों की लंबी परंपरा है जिन्होंने उनसे संगीत ही नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका सीखा। उनकी शिक्षाओं में हमेशा यह भाव रहा कि संगीत केवल अभ्यास नहीं, बल्कि साधना है। उनका मानना था कि संगीत ईश्वर से संवाद है और हर राग, हर तान उस संवाद की भाषा।

काशी से उनका रिश्ता अभिन्न था। गंगा किनारे रियाज़ करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। जब वे मंच पर गाते तो श्रोता कहते—“ये केवल गा नहीं रहे, गंगा बोल रही है।” बनारस की चौक-चौराहों पर, मंदिरों और महफिलों में, उनकी गायकी का जादू पीढ़ियों तक लोग सुनते रहे।

आज जब हम उनकी स्मृतियों को नमन करते हैं, तो लगता है कि उन्होंने हमें केवल संगीत नहीं दिया, बल्कि वह दृष्टि दी जिसके बिना संगीत अधूरा है। उनकी ठुमरी हमें जीवन की मधुरता सिखाती है, उनकी कजरी हमें लोक की गहराई से जोड़ती है और उनके भजन हमें भक्ति का मार्ग दिखाते हैं।

काशी का यह स्वरपुरुष अब मौन है, पर उसकी अनुगूँज आने वाले युगों तक गूँजती रहेगी। पंडित छन्नूलाल मिश्र का जाना एक पीड़ा है, लेकिन उनकी धरोहर हमें यह याद दिलाती रहेगी कि संगीत जीवन का सबसे गहन सत्य है।

ओम् शांति।

Photo Credit: The Hindu

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