भावों का प्रदर्शन है नृत्य तो उन्हें शब्द देना है कविता

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स्वरांगी साने, पुणे

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रस और भाव की अभिव्यंजना से युक्त होता है- नृत्य। रस और भाव…जैसे यह तो हर कला की विशेषता है.. फिर वह नृत्य हो, संगीत हो या कि साहित्य ही। लेकिन ऐसा लगता है कि नृत्य में भावों की प्रधानता कमोबेश अधिक होती है। भावों को प्रदर्शित करने की क्रिया को यदि नृत्य कहा गया है तो उन भावों को शब्द देना कविता हो सकती है। आचार्य नंदिकेश्वर कहते हैं- ‘जब मुँह से गाना गाया जाए, हाथों की मुद्राओं से उस गीत के शब्दों का अर्थ बतलाया जाए, आँखों से उसके भाव दिखाए जाएँ और पैरों से ताल के अनुसार ठेका दिया जाए तब नृत्य होता है।’ क्या यही वजह रही है कि नृत्य में कभी कथक में कवित्त के रूप में, कभी ठुमरी-होरी-चैती के रूप में तो कभी तमाम भारतीय शास्त्रीय नृत्यों में पदों और वंदनाओं के रूप में कविता ने अपनी जगह लगातार बनाई है। मीरा लिखती थी, मीरा नाची थी…जयदेव के शब्द और जयदेव का नृत्य दोनों ही बहुश्रुत है। इतना कि जैसे लिखना और नाचना एक ही सिक्के के दो पहलू हों.. और जो नाच नहीं पाए उन्होंने भी लिखा… नृत्य पर लिखा.. लिखकर नृत्य के होने को घटित कर दिखलाया…

पर्शिया के कवि रूमी कहते हैं- ‘नाचो जब तुम्हारा दिल टूटे, नाचो जब कभी सिर फूटे, नाचो जब तुम्हारे जख्मों को उधेड़ दिया जाए, नाचो जब सरेबाज़ार तुम्हारे गुस्से को छेड़ दिया जाए, ऐसे नाचो कि नाच तुम्हारे खून में हो, ऐसे नाचो कि तुम पूर्ण मुक्त हो’। तभी तो ओशो कहते हैं कि नाचो ऐसे कि नाच बचे ही नहीं। वे एक कहानी सुनाते हैं- पश्चिम के नर्तक की। ‘पश्चिम का बहुत बड़ा नर्तक हुआ- निजिंस्की। ऐसा नर्तक, कहते हैं मनुष्य जाति के इतिहास में शायद दूसरा नहीं हुआ है। उसकी कुछ अपूर्व बातें थीं। एक अपूर्व बात तो यह थी कि जब वह नृत्य की ठीक – ठीक दशा में आ जाता था – जिसको मैं नृत्य की दशा कह रहा हूँ जब नर्तक मिट जाता है – तो निजिंस्की ऐसी छलांगें भरता था कि वैज्ञानिक चकित हो जाते थे। क्योंकि गुरुत्वाकर्षण के कारण वैसी छलांगें हो ही नहीं सकतीं। मैं तुमसे कहता हूँ नृत्य की परिभाषा : जब नर्तक मिट जाए। ऐसे नाचो, ऐसे नाचो कि नाच ही बचे। ऊर्जा रह जाए, अहंकार का केंद्र न रहे।’

अहंकार का केंद्र तज देना है नृत्य करना। मंच को नमस्कार, वाद्यवृंदों को नमस्कार, साजिंदों को नमस्कार, दर्शकों को नमस्कार, गुरु को नमस्कार करने के बाद साकार किया जाता है नृत्य। उससे पहले जो कुछ होता है, वह सब होता है काम-क्रोध, मद-मोह.. लेकिन मंच पर जाने के बाद जो होता है वह है- विराग… अनासक्ति का भाव। सूरदास नर्तक नहीं थे लेकिन जब वे कहते हैं ‘अब हों नाच्यौ बहुत गोपाल’ तो उनके भाव को समझना जैसे नर्तक हो जाना है। नृत्य से जुड़ी कितनी बातें उनके इस पद में आती हैं जैसे- ‘महामोह के नूपुर बाजत, भरम भर्‌यौ मन भयौ पखावज, चलत कुसंगति चाल॥ तृसना नाद करति घट अन्तर, नानाविध दै ताल।’ और तुलसीदास के भजन ‘ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां’,.. को कोई कैसे बिसरा सकता है? नव रसों में भक्ति और वात्सल्य रस का प्रकटीकरण जब कथक नृत्य द्वारा मंच पर किया जाता है तो इस भजन की याद अनायास हो उठती है। जिसमें आलम्बन है राम। छोटे बालक का आलम्बन विभाव, सौंदर्य, क्रीड़ा आदि उद्दीपन विभाव हैं जबकि बालक को स्नेह से गोद में लेना, आलिंगन, चुंबन आदि व्यभिचारी भाव हैं- ‘किलकि किलकि उठत धाय/गिरत भूमि लटपटाय / धाय मात गोद लेत…बोलत मुख मधुर मधुर… तुलसीदास अति आनंद.. देख के मुखारविंद…’

जबकि श्रीकृष्ण रति भक्ति रस का स्थायी भाव है। अपने आराध्य श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबकर सारा दर्द भूल जाती है और प्रेम बावली मीरा मंदिरों में स्वच्छंद भाव से नाच उठती है- पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे।’ मीरा कहती थी – ‘पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे, लोग कहे मीरा भई बावरी… राणाजी मैं साँवरे के रंग राँची… सज श्रृंगार, बाँध पग घुँघरू.. लोक लाज तजि नाची’ अपने प्रिय प्रभु गिरिधर नागर की चाह में बावरी होकर नाचने वाली मीरा हो जाना अपने आप में साधना है। जब बात सुर की हो, तुलसी की हो, मीरा की हो और कबीर की न हो तो ऐसा कैसे संभव है? कबीर कहते हैं- ‘नैहरवा हमका न भावे… केहि विध ससुर जाऊँ मोरी सजनी विषय रस नाच नचावे… बिन सतगुरु अपनो नहीं कोई अपनो नहीं कोई जो यह राह दिखावे…’

हम इन्हें भक्ति काल के कवि कहकर साहित्यिक क्षेत्र तक सीमित नहीं कर सकते क्योंकि भले ही यह इसलिए नहीं लिखे गए थे कि इन पर नृत्य हो लेकिन नृत्य हुआ.. नृत्यमय यह हुए। भरत मुनि ने रसों को जिस क्रम में लगाया उसमें सर्वप्रथम श्रृंगार को स्थान दिया गया और सबसे अंत में शांत रस को। कबीर के शब्दों में ‘बिन सतगुरु’ उस शांत रस तक पहुँच भी नहीं सकते हैं। माना कि इन पदों को नृत्य करने के आयाम को ध्यान में रखकर नहीं लिखा गया और इसलिए कई नर्तकों ने स्वयं ठुमरियों-कवित्त की रचनाएँ कीं जिन्हें खासकर नृत्य के त्रिआयामी रूप को ध्यान में रखकर लिखा गया जैसे कि बिंदादीन महाराज रचित – ‘सब बन ठन आई श्यामा प्यारी’ – वासकसज्जा अभिसारिका नायिका का वर्णन करती हुई ठुमरी। ठुमरी की उत्पत्ति लखनऊ  के नवाब वाज़िद अली शाह  के दरबार से मानी जाती है। वे खुद ‘अख्तर पिया’ के नाम से ठुमरियों की रचना करते और गाते थे। नवाब वाजिद अली शाह द्वारा लिखी गई पुस्तक बानी में 36 प्रकार के रहस वर्णित हैं। ये सभी कथक शैली में व्यवस्थित हैं और इन सभी प्रकारों का अपना एक नाम है, जैसे घूँघट, सलामी, मुजरा, मोरछत्र, मोरपंखी आदि। इन के साथ-साथ इस पुस्तक में रहस विशेष में पहनी जाने वाली पोषाकों, आभूषणों और मंचसज्जा का विस्तृत वर्णन है।

मतलब साफ है कि जो नृत्य करते हों उन्होंने ही नृत्य पर लिखा हो तो ऐसा नहीं, बल्कि जो नर्तक नहीं थे वे भी नृत्य पर लिखते चले आ रहे हैं। ब्राजील के प्रसिद्ध पाओलो कोएलो के उपन्यास ‘द विच’ की नायिका नृत्य करते हुए झूमने लगती है, यदि कोई नर्तक इस उपन्यास को पढ़ेगा तो उसे लगेगा कि कई बार वह भी इस तरह की अनुभूतियों से गुज़रा है। अपने देश में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जब अपनी लंबी कविता तांडव में कहते हैं कि ‘नाचो, हे नाचो, नटवर!’ तो बिरला ही होगा जिसका ओत-प्रोत नाचने के लिए प्रेरित न हो उठता हो। उसका एक-एक शब्द स्फुरण का संचार करता है कि ‘आदि लास, अविगत, अनादि स्वन,अमर नृत्य – गति, ताल चिरन्तन,अंगभंगि, हुंकृति-झंकृति कर थिरक-थिरक हे विश्वम्भर !’… और निराला की वरदे वीणा वादिनी  कविता में भी तो आते हैं ये शब्द – ‘नव गति, नव लय, ताल-छंद नव, नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव; नव नभ के नव विहग-वृंद को नव पर, नव स्वर दे !’

अत: हम कह सकते हैं कि जहाँ एक ओर कविता को नई गति, नई लय, नए स्वर की चाहना रही है वहीं ब्रजभाषा के कवित्त-सवैये भी कथक नृत्य के भाव पक्ष के अपरिहार्य अंग बने हैं। कविता के शब्दों के साथ तबला, पखावज व नृत्य के बोल जब मिल जाते हैं तो वे कवित्त हो जाते हैं जिसे लय के साथ पढन्त करते हुए प्रस्तुत किया जा सकता है। जिस कविता में अंतर्निहित लय और छंद हो वह निश्चित ही नृत्य से जुड़ी मानी जा सकती है। अस्तु!

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