डॉ. शशिकांत तांबे – एक तपस्वी संगीत साधक की विदाई

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भारतीय शास्त्रीय संगीत की सुरमयी परंपरा को आत्मा से जीने वाले इंदौर के वरिष्ठ शास्त्रीय गायक, डॉ. शशिकांत तांबे अब हमारे बीच नहीं हैं। उनका निधन न केवल मालवा अंचल की सांगीतिक संस्कृति के लिए एक गहरा आघात है, बल्कि उन सभी के लिए व्यक्तिगत क्षति है जिन्होंने उन्हें एक गुरु, एक रसिक, एक सच्चे संगीत साधक के रूप में जाना।

“Bhairavi… of life” — यही शब्दों में अपने पिता, डॉ. शशिकांत तांबे के अंतिम विदा को सलील तांबे ने समेटा।

फेसबुक पोस्ट में उन्होंने लिखा:

“बहुत दुख के साथ सूचित कर रहा हूँ कि मेरे पिताजी, डॉ. शशिकांत तांबे, का आज इंदौर (भारत) में आकस्मिक निधन हो गया। वे एक प्रतिष्ठित गायक, अद्वितीय संगीतकार, गुरु, मार्गदर्शक, राष्ट्रपति स्वर्ण पदक विजेता, और आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के अनुभवी कलाकार थे। उन्हें कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा गया था।”

“एक डॉक्टरेट और केमिस्ट्री के प्रोफेसर होने के साथ-साथ उनका जीवन सादगी, ईमानदारी और निष्ठा का आदर्श था।”

“वे 87 वर्ष की उम्र में भी पूरी तरह स्वस्थ, ऊर्जावान और सक्रिय थे — वे न केवल गा रहे थे, बल्कि वाहन चला रहे थे, मंच पर प्रस्तुतियाँ दे रहे थे, रियाज़ कर रहे थे, पढ़ा रहे थे, खाना बना रहे थे और यात्राएं कर रहे थे।”

“उन्होंने स्वेच्छा से नेत्रदान की पेशकश की थी, जो आज पूरी कर दी गई।”

“मुझे विश्वास है कि उनका संगीत और स्मृतियाँ आने वाले वर्षों तक अनगिनत लोगों के मन और आत्मा में गूंजती रहेंगी।”

डॉ. शशिकांत तांबे का यह जीवन, जहाँ रागों की साधना और रसायन विज्ञान का संयम एक साथ चला, वास्तव में ‘भैरवी’ की तरह — समापन में भी मधुर, शांत और पूर्ण था।

“उस समय में जब हर कलाकार किसी समिति, सम्मान, प्रचार, कवरेज, मंच या कार्यक्रम को हासिल कर लेने के लिए अधीर है; डॉ. शशिकांत तांबे इन धतकर्मों से कोसों दूर रहे। तांबे साहब की पहचान किसी उपाधि या प्रचार से नहीं, बल्कि उनकी तासीर और तबीयत से होती थी। संगीत उनके लिए केवल रागों की बंदिश नहीं, जीवन दर्शन था। संजय पटेल ने उन्हें ‘शास्त्रीय संगीत का एनसाइक्लोपीडिया’ कहा और बताया कि वे उन विरले कलाकारों में थे जो मंच से अधिक महफ़िलों और संवादों में चमकते थे। वे नाम से तांबे थे, लेकिन उनका कलाकार तो सोने जैसा खरा था।” संजय पटेल, कला समीक्षक

डॉ. तांबे ने इंदौर और मालवा की कई युवा आवाज़ों को तराशा, लेकिन कभी भी उनके नाम से श्रेय लेने का प्रयास नहीं किया। वे कलाकारों को दबाव में नहीं रखते थे, बल्कि उनके आत्मिक विकास में विश्वास रखते थे।

“नई पीढ़ी को गाते देख खुश होते ही थे और कभी किसी को क्रिटिसाइज़ करते नहीं दिखे, हमेशा प्रोत्साहन देते रहे।” कनकश्री भट, गायिका

उनकी शिष्या, गायिका हेमांगी भगत नेने उन्हें स्मरण करते हुए लिखती हैं:

“बहुत छोटी उम्र से सर के पास सीखना शुरू किया… सबसे पहला बड़ा ख्याल, नाट्यगीत, ठुमरी, दादरा, अभंग… गायन के साथ-साथ जीवन को जीने की कला भी आपसे सीखी। सहज, सरल, खुशमिजाज, ज़िंदगी को सकारात्मक जीने वाले मेरे गुरु – आदरणीय तांबे सर को मेरा नमन।”

डॉ. टीना तांबे, प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना, उन्हें एक प्रेरणास्रोत मानते हुए कहती हैं:

“एक महान कलाकार, जिनका जीवन सरलता, सकारात्मकता, प्रसन्नता तथा आशावाद का प्रतीक था… आपका सांगीतिक योगदान सदैव स्मरण किया जाएगा।”

उनके केवल शिष्य ही नहीं, अनेक कलाकारों और कला प्रेमियों से उनके आत्मीय संबंध रहे। संदीप राशिनकर लिखते हैं:

“नीमच से ही पिताजी वसंत राशिनकर के आत्मीय मित्रों में शुमार रहे आदरणीय तांबे काका का पारिवारिक स्नेह रहा है। उनका निधन सांगीतिक क्षेत्र के साथ ही मेरी भी पारिवारिक अपूरणीय क्षति है!”

डॉ. तांबे की संगीतप्रेमी छवि इंदौर के सांस्कृतिक जीवन में कितनी गहराई से रची-बसी थी, इसका वर्णन स्वानंद किरकिरे की बाल्यस्मृतियों में मिलता है:

“डॉ. शशि ताम्बे – शशि काका! इंदौर के शास्त्रीय संगीत का एक स्वर्णिम अध्याय! मेरे बचपन की बहुत सी यादें जुड़ी हैं उनके साथ! एक ज़माने में हर रविवार कभी इस और कभी उस गायक के घर में संगीत की महफ़िल जमती थी… शशी काका का जूनी इंदौर वाला घर और उनके घर की वो महफ़िलें कभी भूल ही नहीं सकता!”

और जीवन के अंतिम क्षणों तक संगीत से उनका नाता अटूट बना रहा। कला प्रेमी अभिषेक गावड़े लिखते हैं:

“सिर्फ़ १५ मार्च को विवेक के घर भजनों की महफ़िल हुई थी। उम्र ८५ होने के बावजूद आदरणीय तांबे सर ने अपनी दमदार गायकी से वहाँ मौजूद सभी का दिल जीत लिया। शायद यही सर की आख़िरी महफ़िल होगी। बहुत ही सहज, सरल और हमेशा खुशमिजाज रहने वाले आदरणीय शशिकांत तांबे सर।”

डॉ. तांबे का जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक कलाकार अपने स्वर से नहीं, अपनी सादगी, आत्मा और विनम्रता से पहचाना जाता है। उन्होंने कभी अपने नाम के आगे ‘पंडित’ लगवाने की ज़रूरत नहीं समझी, न ही आयोजनों की चकाचौंध में खोए। वे एक सात्विक संगीत योद्धा थे – एक ऐसा ‘शशि’ जो इंदौर की सांगीतिक रातों को उजास देता रहा।

ॐ शांति।


यह लेख विभिन्न कलाकारों व कला प्रेमियों की सोशल मीडिया पोस्ट पर आधारित है। चित्र साभार – सलिल तांबे

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